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Friday, September 17, 2010

संभावित दुर्घटना

यदि "कर्मैव सदा सुरुचि बखाना संतही मोहि अगणित जाना " का प्रभाव मेरे विचारो पर नहीं होता तो निश्चित रूप से आज एक वाहन चालकसे भिडंत हों गयी होती जो अपनी मोटर साइकल से मेरी कार का पीछा करते हुए मेरे पास आकर यह बोले कि पिछले मोड़ पर मेरे कार मोड़ने से पीछे आ रही उनकी मोटर साइकल जो अचानक हुए इस प्रकरण को झेलने के लिए तैयार नहीं थी और लगभग एक गड्ढे में जाने को तैयार हों गयी थी बड़ी मुश्किल से संभाली जा सकी ! मेरे माफी माँगने पर उनका गुस्सा ठंडा हुआ पर मुझे अंत तक यह समझ नहीं आया कि इसमें मेरी गलती क्या थी ? वैसे भी आजकल दिल्ली शहर में गड्ढो की कमी नहीं है जो राष्ट्र मंडल खेलों में आने वाले मेहमानों के स्वागत के लिए लगभग तैयार बैठे हैं ! पर मजेदार वाकया तब पैदा हुआ जब उन्होंने अपने हाथो पर बंधी हुयी एक आध पट्टियों की ओर इशारा करते हुए यह बताया कि वे चोटे भी उन्हें इसी प्रकार मोटर साइकल के गड्ढे में जाने से प्राप्त हुयी हैं ! अब मुझे समझ नहीं आया कि उनसे पूछूं कि उनकी मोटर साइकल को बार बार गड्ढे में जाने की क्यों सूझती है पर जैसा कि मर्फी का नियम कहता है कि यदि बुरा होने की संभावना हों तो वैसा होगा जरूर !

Sunday, June 13, 2010

अपराध की समसामयिक समाजशात्रीयता

ज्यामिति का एक मूल सिद्धान्त शायद आजकल की विश्लेषणात्मक पत्रकारिता को भा गया है और वो यह है कि दो बिन्दुओं से होकर एक रेखा खींची जा सकती है और यदि तीन बिन्दुओं से एक रेखा खींची जा सकती है तो वे एक रेखा में होंगे और उनसे होकर मात्र एक ही रेखा खींची जा सकती है
मेरा अभिप्राय किसी विशिष्ट ज्यामिति समस्या को सुलझाना नही वरन यह बताना है कि किस प्रकार एकाधिक घट्नाओं को उदाहरण बनाकर एक सामाजिक सिद्धान्त बना दिया जाता है हाल के दिनो मे हुई दो घटनाओं की बानगी देखिये दिल्ली के मुनीरका इलाके में रहने वाली एक लड़्की की हत्या उसके ग्रुह प्रदेश झारखन्ड में हो जाती है पुलिस द्वारा खोजबीन करने पर पता चलता है कि उसके घर वाले उससे विजातीय लड़्के से प्रेम करने के कारण नाराज थे दूसरी घट्ना दिल्ली के मदनगीर (अथवा खानपुर) इलाके की है जहाँ पर उत्तर प्रदेश के कानपुर की रहने वाली एक साफ़्टवेयर एन्जीनियर की हत्या हो जाती है पुलिस खोजबीन में शक उसके मंगेतर पर जाता है
अब इन घटनाओं की साम्यता देखिए शायद आपको समझ न आए पर समाज शास्त्रीय द्रष्टि रखने वाले कतिपय स्तंभकार अथवा विश्लेष्णकारों को कई साम्यताएं दिख जायेंगी जैसे दोनो ही घटनाओं मे प्रेम विजातीय लड़्के लड़कियों के बीच था दोनो ही घटनाओं में लड़का लड़की दिल्ली से बाहर के छोटे शहरों से आये थे, दोनो ही घटनाओं में लड़्की की हत्या हुयी है न की लड़्के की इत्यादि
अब इन घटनाओं से बहुत से सामान्य निष्कर्ष निकाले जायेंगे और स्वभावत: येह निष्कर्ष किन्ही समाज्शास्त्रीय परिकल्पनाओं अथवा मनो-अवरोधों पर आधारित होंगे यदि आपको विश्वास न हो तो किसी भी न्यूज चैनल अथवा समाचार पत्रों की विश्लेषण देख पढ़ लीजिए

Wednesday, February 17, 2010

चन्द अशार

आप के खतों के हरफ दीखतें दो के चार हैं
आज लगता है फिर बारिश के आसार हैं

Monday, February 8, 2010

संता की अहमियत

आज सुबह एक जोक पढ़ रहा था । "संता सिंह की पत्नी अपने ड्राईवर के साथ भाग गयी । किसी ने पूछा अब क्या करोगे संता ने जवाब दिया करना क्या है । अब तो गाडी खुद ही चलानी पड़ेगी । " पढ़ कर हंसी आई और यह भी सोचने का मन हुआ कि संता (या बंता) या उन जैसे अनेक चरित्रों की जरूरत क्यों पड़ती है ? क्या हममे अपने ऊपर हंसने का हौसला नहीं है ? यह तो हम सभी को मानना पड़ेगा कि कामन सेन्स या सामान्य समझदारी (अथवा इसकी अनुपलब्धता ) किसी समूह विशेष का लक्षण नहीं हों सकता है । पर किसी समूह विशेष के साथ ऐसी (मूर्खतापूर्ण ) बातें जोड़ने से दो फायदें होते हैं पहला लक्षित श्रोता को यह समझ आ जाता है कि किसी चरित्र विशेष को ही एक मूर्खतापूर्ण हरकत करनी है (मैं शब्दों के चयन के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ)। दूसरा सामान्य व्यक्ति भी कामन चरित्रों के गिर्द छोटी कहानियाँ या चुटकुले गढ़ लेता है । एक सामान्य सा उदाहरण देता हूँ । उत्तर भारत में अकबर बीरबल के चुटकुले इतने प्रसिद्द हुए हैं कि यह विश्वास करना ही असंभव हों जाता है कि इनमे से कई का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है और यह हम सब के द्वारा ही गढ़े गए हैं।
ऐसे चरित्र अधिकांशतः स्थानिक होते हैं और स्थानीय जरूरतों के अनुसार ही गढ़ लिए जाते हैं जैसे कि यूरोपियन और अमेरिकन माध्यमों में प्रचलित ब्लोंडे । मेरा पूर्ण विश्वाश है कि ऐसे चरित्रों की गवेश्नात्मक खोज कर किसी भी समाज के बारे में अनेक बातों का पता लगाया जा सकता है । यह चरित्र हमें हंसाते हैं गुदगुदाते हैं और चहरे पर मुस्कान लाते हैं । कारण कोई भी हों इनकी उत्पत्ति का हम हमेशा ही इनके आभारी रहेंगे हमें हंसाने के लिए ।

Saturday, February 6, 2010

ख्वाहिशें

मौजूँ है ढका आसमाँ जैसे एक मुसाफ़िर के बसर के लिए
मौजूँ है बुझती हुई शमा जैसे अगवानी में सहर के लिए
उस एक "पल की" यादें जरुरी हैं जैसे सारी उमर के लिए
जख्म पुराना ही सही पर जैसे जरुरी है शायर के लिए
जिसे सहेज कर रख सकूँ ऐसी यादें नज़र कर जाइएगा
दोस्ती कीजिए या दुश्मनी बस रिश्ते बनाकर जाइएगा

तारीखों में जो नज़र ही न आए वो इतिहास ही नही
अंदर जो घुट कर मर जाए वो एहसास ही नही
वक्त के साथ जो उम्मीद दफ़्न हो जाए वो रास्तों की तलाश नहीं
जिसके बिना भी जिंदगी चल जाए किसी के आने की आस नही
हर जगह आप मिलें बारिश की बूँदे बन बिखर जाइएगा
दोस्ती कीजिए या दुश्मनी बस रिश्ते बनाकर जाइएगा

जिनके पास रोशनी के समुन्दर हों वो दुआ करें कि रात लम्बी हो
जिन्हे लहरों पर भरोसा न हो वो कहें साथ के लिए पगडंडी हो
जो हमेशा गम के मारें हों दुनिया उनके लिए गमगीन हो
खूबसूरती की ख्वाहिश हर सिम्त जिन्हें हर पल उनका हसीन हो
’शैल’ के ख्वाबों की ताबीर आप हैं तसव्वुर में ठहर जाइएगा
दोस्ती कीजिए या दुश्मनी बस रिश्ते बनाकर जाइएगा

Wednesday, February 3, 2010

टाइम मशीन : तर्क आधारित संभावनाए

टाइम मशीन : तर्क आधारित संभावनाए
हाल ही में एक वैज्ञानिक लेख पढ़ रहा था टाइम मशीन पर लेख का संपूर्ण विषय टाइम मशीन की संभावना तर्कके धरातल पर तलाश कर रहा था इस विषय पर कोई संदेह नहीं रहा है कि विज्ञान की संपूर्ण अवधारणा ही तर्कके धरातल पर रखी गयी है। कई महत्वपूर्ण खोजें मूर्त रूप लेने से पहले तर्क की कसौटी पर खरी उतर चुकी थी इन खोजों में एक महत्वपूर्ण अध्याय परमाणु बम की खोज का है अमेरिकी (और कुछ खोजो के अनुसार जर्मन ) वैज्ञानिकों के सफलतापूर्वक परमाणु बम के परीक्षण से बरसों पहले ही आइएन्स्टीन ने पदार्थ के ऊर्जा में परिवर्तनकी भविष्यवाणी कर दी थी। अतः इन आधारों पर टाइम मशीन की संभावना पर विराम तो नहीं लगाया जा सकताहै , पर मूल प्रश्न उन तार्किक आधारों का है जिनका उपयोग टाइम मशीन की संभावना (या असम्भावना) का पतालगाने के लिए किया जाता है सबसे महत्वपूर्ण आघात टाइम मशीन की अवधारणा पर यह कह कर लगायाजाता है कि वास्तविकता में टाइम मशीन का उपयोग कर कोई भी अपने भूतकाल को बदल सकता है जो कि तर्ककी कसौटी पर खरा नहीं उतरता इसे एक सामान्य (परन्तु सार्वाधिक उध्रत )उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं यदिकोई मनुष्य अपने अतीत में जाकर स्वयं के माता-पिता की हत्या कर दे तो उसका जन्म ही संभव हों सकेगा परन्तु यह उसके वर्तमान स्वरूप का विरोधाभासी होगा क्योंकि उसने स्वयं ही यह कृत्य (अपना अस्तित्व समाप्तकरने का) किया है अर्थात टाइम मशीन की अवधारणा स्वतः अंतर्विरोधी होने के कारण स्वीकार्य नहीं है।
परन्तु
मेरे विचार में इस तर्क का आधार ही अंतर्विरोधी है आइन्स्टीन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत के अनुसारसंसार की समस्त घटनाएं सापेक्ष होती हैं इसका अर्थ यह हुआ कि प्रत्येक घटना एक मूल बिंदु के सापेक्ष घटितहोती है। जैसे यदि कोई व्यक्ति चालित वाहन में सवार है तो वह उसी वाहन में सवार अन्य व्यक्ति के सापेक्ष स्थिर हैजबकि वाहन के बाहर खड़े दर्शक के सापेक्ष चालित अवस्था में है स्वभावतः दोनों व्यक्तियों का आकलन अपनेअपने मूल बिंदु के अनुसार सही है
दिए
हुई संभावना में अदि कोई व्यक्ति टाइम मशीन पर सवार होकर अपने अतीत की यात्रा करता है और स्वयंअपना अतीत देखता है तो उसका स्थान एक प्रेक्षक जैसा होगा (उदाहरण में दिए हुए प्रेक्षक की तरह) ऐसे में यदिउसे कोई कृत्य करना होगा तो उसका प्रेक्षक का स्तर नहीं रहेगा
जैसे यदि कोई चलते हुए वाहन से उतर कर अपने पीछे आने वाले वाहन को देख रहा है तो वह उस वाहन के लिएप्रेक्षक हैपरन्तु यदि वह उस वाहन में सवार हों जाता है (उदाहरण में दिए गए कृत्य की तरह )तो उसका प्रेक्षकका स्तर समाप्त हों जाएगाअतः तर्क स्वयं में अंतर्विरोधी है
इस परिकल्पना का दूसरा अंतर्विरोध इसका (टाइम मशीन का ) समय के निरपेक्ष गति करना है। वर्त्तमान स्वरूपमें समय के सापेक्ष गति करना संभव हैजैसे यदि कोई टाइम मशीन में सवार होकर के भविष्य में जाना चाहताहै तो प्रथमतः समय की गति से तेज चलना होगा (जो कि तब ही संभव होगा जब प्रकाश की गति से तेज चलनासंभव हों ) क्योंकि समय की गति स्थिर है और समय की गति से तेज चलने पर वर्त्तमान की घटनाएं अलग अलगफ्रेम में दिखाई देंगीऔर उनमे प्रवेश करना संभव हों सकेगा
अंततः टाइम मशीन की संभावना अकल्पित नहीं होगी यदि उन तर्कों को ढूंढा जा सके जिन पर इसका आधारतैयार हों सकेहों सकता है कि यह किसी अनजानी खोज के बाद संभव हों

Thursday, January 28, 2010

तकनीक का अधूरा ज्ञान यानी मुश्किलों की खान

तकनीक का अधूरा ज्ञान यानी मुश्किलों की खान
टेक्नोलोजी का अधूरा ज्ञान कभी कभी कैसी मुश्किलें पैदा कर देता है इसका एहसास अभी हुआ। कम्प्यूटर साइंसका विद्यार्थी कभी नहीं रहा और जो थोडा बहुत ज्ञान मिला वह इन्टरनेट के अनवरत प्रयोग गलतियों के सबक सेपर जो गलतियाँ अनुत्क्रम्नीय होती हैं वह ज्यादा मुश्किलें पैदा कर जाती हैं। तो हुआ यह कि विंडो पर इन्विस्ब्लफोल्डर पैदा करने का पता चला। तरीका यह बताया गया कि पहले आल्ट ०१६० से फोल्डर का नाम गायब कर दोउसके बाद आप्शन मेनू में जा कर इन्विसिब्ले आइकोन चुन लो (मुझे पता है कि इस क्षेत्र में धुरंधर लोगों के लिएयह बच्चों के खेल जैसा ही है) और जब वापस फोल्डर को विसिबल करना है तो सारे प्रोसेस उलटा कर दो मसलनविसिब्ले इकों चुन लो और रीनेम आप्शन से फोल्डर का कोई नाम रख दो। यह तरीका windows क्स पी में तोकाम कर गया, पर जब इसे विस्ता में चलाया तो पता लगा कि नाम गायब तो हो गया पर रेनेम नहीं हो पा रहा है।फिर भी उम्मीद बाकी थी की फोल्डर डिलीट कर लेंगे, पर बिना नाम के फोल्डर साहब डिलीट कैसे होते (शायद मरकर चित्रगुप्त महाराज के पास अपने अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब नाम देख कर ही करना होता है !!)
अब
ऐसे चार फोल्डर अंगद के पाँव की तरह मेरे डेस्कटॉप पर जमे हुए हैं कि हटाओ तो जानू ? लोग चलते फिरतेपूछ लेते हैं कि यह करिश्मा कैसे किया तो समझ में नहीं आता कि क्या बताऊ। वेब हेल्प लेने कि कोशिश कि तोपता लगा कि कमांड प्रोम्प्ट में जाकर इन सबका पुनः नामकरण किया जा सकता है पर बेकार (किन्ही पंडित जीको बुलाकर यह नामकरण हो सकता है तो मुझे जरूर बताएयेगा) मुझे पता है कि इसका कोई कोई हल अवश्यहोगा पर मेरे जैसे अर्ध तकनीकी व्यक्ति के लिए नहीं है ऐसे प्रयोग यह समझ में चूका है !